पूरा लेसन
ऊर्जा हर चीज में लगती है: ट्रांसपोर्ट, फैक्ट्रियां, खाद, आपका बिजली का बिल। जब इसके दाम अचानक उछलते हैं, तो इसे ऊर्जा का झटका (एनर्जी शॉक) कहते हैं, और पूरी अर्थव्यवस्था इसे महसूस करती है।
1973: अरब के तेल उत्पादक देशों ने इजराइल का साथ देने वाले देशों को तेल की सप्लाई घटा दी। कुछ ही महीनों में कच्चे तेल के दाम करीब चार गुना हो गए, और उसके बाद कई साल ऊंची महंगाई और कमजोर ग्रोथ का दौर चला।
2022: रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद कच्चा तेल $120 के पार उछल गया (चार्ट), और अपने शिखर पर यूरोप में गैस के दाम सामान्य स्तर के दस गुना से भी ज्यादा थे।
ऊर्जा का खर्च ट्रांसपोर्ट और खाने-पीने की चीजों में जुड़ता है, इसलिए पीछे-पीछे महंगाई आती है। यूरोजोन में महंगाई 10.6% के रिकॉर्ड पर पहुंची, और सितंबर 2022 में इंडोनेशिया ने सब्सिडी वाले ईंधन के दाम करीब 30% बढ़ा दिए।
किसका फायदा, किसका नुकसान: नॉर्वे, सऊदी अरब और कनाडा जैसे निर्यातक ज्यादा कमाते हैं; जापान, भारत और यूरोप के बड़े हिस्से जैसे आयातकों को ज्यादा चुकाना पड़ता है, और उनकी करेंसी पर दबाव आ सकता है।
- आम गलती
गलती: यह सोचना कि झटका हमेशा बना रहेगा। ऊंचे दाम मांग घटाते हैं और नई सप्लाई लाते हैं: 2023 में यूरोप में गैस के दाम काफी नीचे लौट आए।
- मुख्य बात
ऊर्जा के झटके हर जगह महंगाई बढ़ाते हैं, निर्यातकों को फायदा और आयातकों को नुकसान पहुंचाते हैं, और डिमांड और सप्लाई के संभलने के साथ आमतौर पर फीके पड़ जाते हैं।
झटपट जांच
- ऊर्जा का झटका क्या है?
- ऊर्जा के दामों में अचानक उछाल
- बिजली का सस्ता बिल
- एक नई तरह की बैटरी
- ऊर्जा के झटके आमतौर पर महंगाई को…
- बढ़ाते हैं
- घटाते हैं
- जस का तस रखते हैं
- कच्चे तेल के ऊंचे दाम से किसे फायदा हो सकता है?
- तेल निर्यातक देशों को
- किसी को नहीं
- सिर्फ तेल आयातक देशों को
- ऊर्जा के झटके से खाने-पीने की चीजें भी महंगी क्यों होती हैं?
- ट्रांसपोर्ट और खाद के लिए ऊर्जा चाहिए
- खाने के दाम तेल के बैरल में तय होते हैं
- झटके के दौरान सरकारें खाने पर ज्यादा टैक्स लगाती हैं
भू-राजनीति
- जंग और तेल के दाम
- ऊर्जा के झटके
- प्रतिबंध और बाजार
- चुनाव और बाजार
- कीमतें हिलाने वाले समुद्री रास्ते
- टैरिफ और ट्रेड वॉर
- महामारी और बाजार