पूरा लेसन
पेंशन फंड, बीमा कंपनियां और कई सेविंग्स ऐप, सभी एक ही तरह की कंपनी को पैसा सौंपते हैं: एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC)। इसके फंड मैनेजर तय करते हैं कि अरबों डॉलर कहां लगें।
एक्टिव फंड एक्सपर्ट्स को पैसे देते हैं, ताकि वे निवेश चुनें और बाजार से आगे निकलने की कोशिश करें। पैसिव फंड बस किसी इंडेक्स की नकल करते हैं, जैसे S&P 500 या भारत का निफ्टी 50, और वह भी कम खर्च में।
सबसे बड़ी कंपनी ब्लैकरॉक $10 ट्रिलियन से ज्यादा की रकम संभालती है। यह जापान की सालाना GDP के दोगुने से भी ज्यादा है।
लंबे समय का रिपोर्ट कार्ड कड़वा सच दिखाता है। 15 से 20 साल के दौर में अमेरिका की बड़ी कंपनियों में निवेश करने वाले करीब 90% एक्टिव फंड S&P 500 से पीछे रहे।
इसकी एक बड़ी वजह फीस है। $10,000 अगर 30 साल तक हर साल 7% बढ़ें, तो करीब $76,000 हो जाते हैं। 1% सालाना फीस के साथ हाथ आते हैं करीब $57,000: यानी करीब 25% कम।
- आम गलती
भ्रम: “पिछले साल का टॉप फंड इस साल भी आगे रहेगा।” टॉप पर रहने वाले फंड शायद ही वहां टिकते हैं। रिसर्च के मुताबिक कम फीस भविष्य में बेहतर नतीजों के सबसे भरोसेमंद संकेतों में से एक है।
- मुख्य बात
फंड मैनेजर दूसरों का पैसा निवेश करते हैं। ज्यादातर एक्टिव फंड फीस कटने के बाद अपने इंडेक्स से पीछे रहते हैं, इसलिए हमेशा देखें कि फंड का खर्च कितना है।
झटपट जांच
- पैसिव फंड…
- किसी इंडेक्स की नकल करता है
- रोज चर्चित शेयर चुनता है
- सिर्फ कैश रखता है
- लंबे समय में ज्यादातर एक्टिव फंड…
- फीस के बाद अपने इंडेक्स से पीछे रहते हैं
- इंडेक्स से दोगुना रिटर्न देते हैं
- कोई फीस नहीं लेते
- फंड की फीस इतनी मायने क्यों रखती है?
- यह हर साल आपके खिलाफ कंपाउंड होती है
- यह सिर्फ पहले साल चुकानी पड़ती है
- यह टैक्स रिफंड बनकर लौट आती है
- दो फंड एक ही इंडेक्स ट्रैक करते हैं। फंड A सालाना 0.1% लेता है, फंड B 1%। किसमें आपके हाथ ज्यादा आने की संभावना है?
- फंड A
- फंड B
- दोनों बिल्कुल बराबर
इस लेसन के शब्द
फाइनेंस इंडस्ट्री के अंदर
- बैंक पैसा कैसे कमाते हैं
- एक्सचेंज कैसे काम करता है
- मार्केट मेकर और ब्रोकर
- इन्वेस्टमेंट बैंक
- फंड मैनेजर
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- क्रेडिट रेटिंग