पूरा लेसन
आपके पास दो शेयर हैं। एक 20% ऊपर है, दूसरा 20% नीचे। पैसों की जरूरत है। किसे बेचें? ज्यादातर लोग मुनाफे वाला शेयर बेचते हैं।
इस आदत को डिस्पोजिशन इफेक्ट कहते हैं: मुनाफे वाले शेयर बहुत जल्दी बेच देना और घाटे वाले बहुत देर तक पकड़े रहना। घाटे वाला शेयर बेचना ऐसा लगता है, मानो अपनी गलती मान ली हो।
1998 में अर्थशास्त्री टेरेंस ओडीन ने अमेरिका के एक ब्रोकर के 10,000 अकाउंट की स्टडी की। निवेशकों ने घाटे वाले शेयरों के मुकाबले मुनाफे वाले शेयर करीब 1.5 गुना ज्यादा आसानी से बेचे।
और इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। जो घाटे वाले शेयर उन्होंने रखे, उनका प्रदर्शन बाद में उन मुनाफे वाले शेयरों से खराब रहा जो उन्होंने बेच दिए थे। यानी फूल उखाड़ दिए और कांटे रहने दिए।
- आम गलती
भ्रम: “जब तक बेचा नहीं, तब तक नुकसान नहीं।” सच: नुकसान अकाउंट में पहले ही हो चुका है। आपने जो कीमत चुकाई, वह बस एक याद है: बाजार को उसकी कोई खबर नहीं।
- मुख्य बात
खुद से पूछें: “अगर यह पोजीशन पहले से न होती, तो क्या आज यह ट्रेड खोलना ठीक लगता?” जवाब ना है, तो चुकाई गई कीमत इसे पकड़े रहने की वजह नहीं है।
झटपट जांच
- डिस्पोजिशन इफेक्ट यानी…
- मुनाफे वाले जल्दी बेचना, घाटे वाले देर तक रखना
- मुनाफे वाले देर तक रखना, घाटे वाले जल्दी काटना
- पैसा कई एसेट में बांटना
- घाटे वाले ट्रेड पर खुद से पूछने लायक काम का सवाल है…
- क्या आज यह ट्रेड खोलना ठीक होगा?
- इसके लिए कितनी कीमत चुकाई थी?
- ग्रुप चैट वाले क्या सोचते हैं?
- आपका एंट्री भाव…
- बाजार के लिए कोई मायने नहीं रखता
- वह स्तर है जहां कीमत को लौटना ही है
- सपोर्ट स्तर की तरह काम करता है
- ओडीन की स्टडी में, निवेशकों ने जो घाटे वाले शेयर रखे, वे…
- बेचे गए मुनाफे वाले शेयरों से खराब चले
- उछलकर बेचे गए शेयरों से आगे निकल गए
- ठीक मुनाफे वाले शेयरों जितने चले
इस लेसन के शब्द
ट्रेडिंग साइकोलॉजी
- नुकसान ज्यादा क्यों चुभता है
- फूल बेचे, कांटे रखे
- ओवरकॉन्फिडेंस
- जुआरी की गलतफहमी
- FOMO और दिमाग के दूसरे जाल
- टिल्ट और रिवेंज ट्रेडिंग
- अपना ट्रेडिंग प्लान
- ट्रेडिंग जर्नल रखें