पूरा लेसन
क्रैश से पहले बेचें, सबसे नीचे फिर खरीद लें। सुनने में समझदारी लगती है। असल में दोनों फैसले बार-बार सही कर पाना लगभग किसी के बस की बात नहीं।
मार्केट टाइमिंग का मतलब है गिरावटों से बचने के लिए बार-बार बाजार में घुसना और निकलना। बाजार में टिके रहने का मतलब है उतार-चढ़ाव के बीच भी निवेश बनाए रखना।
एक मशहूर स्टडी ने S&P 500 के करीब 20 साल देखे। उसके सिर्फ 10 सबसे अच्छे दिन छूट जाएं, तो आखिर में पैसा उस निवेशक के मुकाबले करीब आधा रह जाता है जो लगातार निवेश में बना रहा।
S&P 500, मासिक औसत, 2019 से 2021 तक। 2020 की शुरुआत में यह एक महीने में करीब एक तिहाई गिरा, फिर अगस्त तक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसके कुछ सबसे अच्छे दिन उन्हीं हफ्तों में आए जिनमें सबसे बुरे दिन आए थे।
लंबी अवधि के कई निवेशक एक आसान आदत अपनाते हैं: तय तारीख पर तय रकम लगाएं और निवेश में बने रहें। इसे DCA कहते हैं, यानी हर महीने तय रकम लगाना। म्यूचुअल फंड की SIP भी इसी तरह काम करती है।
- आम गलती
भ्रम: “माहौल शांत होते ही वापस निवेश कर लेंगे।” उस स्टडी में ज्यादातर सबसे अच्छे दिन सबसे बुरे दिनों के करीब दो हफ्ते के अंदर आए, जब हालात सबसे डरावने दिख रहे थे।
- मुख्य बात
लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए बाजार में टिके रहना आमतौर पर मार्केट टाइमिंग से ज्यादा मायने रखता है।
झटपट जांच
- बाजार की बिल्कुल सही टाइमिंग…
- लगभग नामुमकिन है
- प्रैक्टिस से आसान है
- RSI से पक्की है
- बड़ी तेजी वाले दिन अक्सर आते हैं…
- बड़ी गिरावट वाले दिनों के फौरन बाद
- सिर्फ जनवरी के पहले हफ्तों में
- सिर्फ बाजार के शांत सालों में
- लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए आमतौर पर सबसे ज्यादा क्या मायने रखता है?
- बाजार में टिके रहना
- रोज ट्रेडिंग करना
- लीवरेज का इस्तेमाल
- S&P 500 के करीब 20 साल की स्टडी में 10 सबसे अच्छे दिन छूटने से…
- करीब आधा पैसा ही बचा
- लगभग कोई फर्क नहीं पड़ा
- आखिरी रकम दोगुनी हो गई
इस लेसन के शब्द
निवेश की बुनियादी बातें
- निवेश या ट्रेडिंग?
- कंपाउंडिंग: बढ़त पर बढ़त
- बाजार में टिके रहने की ताकत
- इंडेक्स और ETF
- म्यूचुअल फंड
- बूंद-बूंद जुड़ते खर्च
- सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखें
- आसान पोर्टफोलियो कैसे बनाएं
- पोर्टफोलियो की रीबैलेंसिंग
- तेजी और मंदी का बाजार
- डिविडेंड वाले शेयरों में निवेश